सौतन

 जिस घुंगरू और चुडीयाँ

मे हमारी जान अटकती थी

उनकी खनक से ही, 

          'हम'

खिलखलाने लगते थे, 

वो पहनने की हमें आज 

, इजाजत नहीं है, और 

वहीं हमारी ''आज' सौतन

            बनी है, 



वर्षा प्र पाटील ©®




खिलखलाने लगते थे

वही आज हमें, पहिल की

इजाजत नही 




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